Ajab Gajab

एड्स का इतिहास- जानिए कब, कहां और कैसे अस्तित्व में आई यह बीमारी

World Aids Day हर साल 1 दिसंबर को मनाया जाता है. जागरुकता के लिए एड्स डे मनाया जाता है. एड्स आज दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है. पिछले कई सालों में एचआईवी से संक्रमित लोगों की संख्या में कमी आने की बजाय बड़ी है. बता दे कि एचआईवी से संक्रमित लोगों की सूचि में भारत इस समय तीसरे नंबर पर है, जो कि काफी चिंताजनक है. दुनिया भर के डॉक्टर तीन दशक से ह्यूमन इम्यूनो डेफिशिएंसी वायरस यानी एचआईवी के बारे में जानकारी जुटा रहे हैं. एचआईवी कितना खतरनाक है, इसको हम इससे समझ सकते है कि इन सालों में तीन करोड़ से अधिक लोग एड्स के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं. लेकिन क्या आप जानते है कि एचआईवी की बीमारी कैसे अस्तित्व में आई.

चिंपांजी से इंसानों तक

माना जाता है कि एचआईवी सबसे पहले 19वीं सदी की शुरुआत में जानवरों में देखा गया था. यह बीमारी चिम्पेंजी से इन्सान में आई है. सबसे पहले 1959 में कांगो के एक बीमार आदमी के खून का नमूना लिया गया, जिसे बाद में डॉक्टरों ने एचआईवी वायरस माना. एड्स की पहचान सबसे पहले 1981 में हुई थी. दरअसल उस समय लॉस एंजिलिस के डॉक्टर माइकल गॉटलीब ने पांच मरीजों में एक अलग किस्म का निमोनिया पाया. इन सब मरीजों में रोग से लड़ने वाला तंत्र अचानक कमजोर पड़ गया था.

हुई थी गलतफहमी

बता दे कि यह पांचों मरीज समलैंगिक थे, इसलिए शुरू में डॉक्टरों को लगा कि यह बीमारी केवल समलैंगिकों को होती है. ऐसे में शुरुआत में इस बीमारी का नाम ग्रिड यानी गे रिलेटिड इम्यून डेफिशिएंसी रखा गया. हालाँकि बाद में यह वायरस दुसरे लोगों में भी मिला तो धारणा बदली और बाद में इस वायरस का नाम बदल कर एड्स यानी एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएंसी सिंड्रोम रखा गया. साल 1983 में फ्रांस के लुक मॉन्टेगनियर व फ्रांसोआ सिनूसी ने LAV वायरस की खोज की. इसके एक साल बाद अमेरिका के रॉबर्ट गैलो ने HTLV 3 वायरस की पहचान की. 1985 में पता चला कि ये दोनों एक ही वायरस हैं. 1985 में मॉन्टेगनियर और सिनूसी को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जबकि गैलो ने अपने परीक्षण का पेटेंट कराया. 1986 में पहली बार इस वायरस को एचआईवी यानी ह्यूमन इम्यूनो डेफिशिएंसी वायरस का नाम मिला.

फैला जागरूकता अभियान

1986 के बाद से दुनिया भर में एड्स के खिलाफ जागरूकता अभियान शुरू हो गए. कंडोम को केवल परिवार नियोजन ही नही बल्कि एड्स से बचाव के रूप में देखा जाने लगा. इसके 2 साल बाद यानी 1988 से हर साल एक दिसंबर को world aids day के रूप में मनाया जाने लगा. इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने मलेरिया और टीबी की तरह एड्स को भी महामारी का नाम दिया है.

नहीं बना कोई टिका

सबसे निराशाजनक बात तो यह है कि अभी तक कोई ऐसा टिका नहीं बना है, जिससे एचआईवी का रोकथाम किया जा सके. वैज्ञानिकों के लिए यह टीका चुनौती बना हुआ है. हालाँकि अगर समय रहते वायरस का इलाज शुरू कर दिया जाए तो एड्स से बचा जा सकता है, लेकिन ज्यादातर लोग इसे समझ नहीं पातें है. बता दे कि यह वायरस कई तरह का होता है और शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली पर बुरा असर डालता है.