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रोचक कथा: भगवान गणेश के श्राप के कारण श्रीकृष्ण पर लगा था चोरी का आरोप

हम अक्सर पौराणिक कथाओं में श्राप और वरदान की बातें पढ़ते या सुनते रहते है. पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी-देवताओं को भी कई बार श्राप का सामना करना पड़ा है. श्राप से स्वयं विष्णु अवतार भगवान कृष्ण भी नहीं बच सके और उन्हें चोरी के आरोप को सहन करना पड़ा था. आइये हम आपको बताते है पूरी कहानी, जिसका वर्णन पौराणिक दस्तावेजों में मिलता है.

एक बार पार्वती पुत्र गणेश जी चंद्रलोक से भोज में शामिल होकर लौट रहे थे. जैसा कि हम जानते है कि गणेश जी को मोदक बहुत पसंद है तो उन्होंने भोज में जी भर कर मोदक खाए और कुछ साथ में भी ले आए. इस दौरान रास्ते में गणेश जी के हाथ से एक मोदक गिर गया, जिसे देख चंद्र देव अपनी हंसी नहीं रोक पाए.

चंद्रदेव को हंसता देख गणेश जी क्रोधित हो उठे और उन्होंने चंद्रदेव को श्राप दे दिया कि जो भी उन्हें देखेगा उस पर चोरी का इल्जाम लग जाएगा. गणेश जी के श्राप से चंद्र देव घबरा गए और गणेश जी से माफ़ी मांगने लगे, जिसके बाद गणेश जी ने उन्हें माफ़ कर दिया और उस श्राप को चतुर्थी तक ही सीमित रखा क्यों कि उस दिन चतुर्थी थी. चतुर्थी का चांद ना देखने के पीछे शायद इसी पौराणिक कथा की ही भूमिका है.

द्वापर युग में सत्राजित नाम की राजा के पास स्यमंतक नाम की एक चमत्कारी मणि थी. यह मणि जिसके पास होती थी उसके जीवन में कभी समस्या नहीं आती थी. एक बार जब श्रीकृष्ण ने सत्राजित के मुकुट पर मणि देखी तो उन्होंने सत्राजित से कहा कि इसके असली हक़दार तो जा उग्रसेन हैं. हालाँकि राजा सत्राजित श्रीकृष्ण की बात का जवाब दिए बिना वहां से चले गए और मणि को महल के मंदिर में स्थापित कर दिया.

गणेश चतुर्थी के दिन जब श्रीकृष्ण अपने महल में थे तो उनकी नजर गलती से चंद्र पर पड़ गई. उसी रात सत्राजित के भाई स्यमंतक मणि को धारण किए शिकार पर चले गए, जहां एक शेर ने उन्हें मार गिराया. स्यमंतक मणि भी उस शेर के पेट में चली गई. उस शेर का शिकार जामवंत ने किया और वह मणि हासिल कर ली. जामवंत वह मणि लेकर अपनी गुफा में चले गए.

उधर इस बात से अनजान सत्राजित ने अपने भाई की हत्या और मणि की चोरी का आरोप श्रीकृष्ण पर लगा दिया. इस बात से श्रीकृष्ण को दुःख पहुंचा और वह मणि को खोजते-खोजते जामवंत की गुफा तक पहुँच गए. कृष्ण गुफा में दाखिल हुए और उन्होंने देखा कि जामवंत का पुत्र उस बहुमूल्य मणि से खेल रहा है. इस मणि को पाने के लिए जामवंत और कृष्ण के बीच 28 दिनों तक युद्ध चला.

इतने युद्ध लड़ने के बाद जामवंत को अहसास हुआ कि कृष्ण ही राम हैं, क्यों कि भगवान राम ने जामवंत से पुन: जन्म लेने का वायदा किया था. इसके बाद जामवंत को प्रभु राम के दर्शन हुए और उन्होंने वह मणि श्रीकृष्ण को लौटा दी. श्रीकृष्ण ने वापस आकर वह मणि राजा सत्राजित को लौटा दी. सत्राजित को अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ.