कवि की कलम से 2 – मैंने आँखों में सुर्ख सुरमई ख्वाब बुना, शुक्रिया मेरे दोस्त जो तूने मुझे चुना। 

मैंने आँखों में सुर्ख सुरमई ख्वाब बुना, शुक्रिया मेरे दोस्त जो तूने मुझे चुना।

बीत गए साल यु ही अठखेलियों में, कुछ तेरी कुछ मेरी पहेलियों में,
तूने सुख के सागर में मेरे गम को चुना।
मैंने आँखों में सुर्ख सुरमई ख्वाब बुना, शुक्रिया मेरे दोस्त जो तूने मुझे चुना।।

मैं जो तन्हा हुआ भीड़ में, तो ठिकाना बनाया इस नीढ़ में,
तूने बिन कहे जो मेरा दर्द सुना।
मैंने आँखों में सुर्ख सुरमई ख्वाब बुना, शुक्रिया मेरे दोस्त जो तूने मुझे चुना।।

चल अब चलता हूँ इस याद के साथ, फिर वापस लौटने की फर्याद के साथ,
माफ़ कर देना मेरा हर कहा सुना।
मैंने आँखों में सुर्ख सुरमई ख्वाब बुना, शुक्रिया मेरे दोस्त जो तूने मुझे चुना।।

Rohit