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कवि की कलम से 3 – दो साल हो गए मुझे, पर यहां मेरा केक नहीं कटा है।

इंसान यहाँ दुसरो की खुशी और गम में बटा है।
दो साल हो गए मुझे, पर यहां मेरा केक नहीं कटा है।।

पहले था राईटर, अब में लीडर हो गया,
डरता था पहले अब में निडर हो गया।
मेरे सामने ये संसथान कितना बड़ा-कितना घटा है
दो साल हो गए मुझे पर यहां मेरा केक नहीं कटा है।।

सब कुछ है वही या फिर कुछ बदलाव आया है,
अपनों से लड़ते हुए यहां मेने अपनों को पाया है।
दोस्त यह दोस्ती से थोड़ा पीछे हटा है,
दो साल हो गए मुझे यहां पर मेरे केक नहीं कटा है।।

बहुत से आये और चले गए,  कुछ रुके और परिस्थितियों में ढल गए,
हर किसी का विचार यहां एक दूसरे से नहीं पटा है।
दो साल हो गए मुझे, पर यहां मेरा केक नहीं कटा है।।

अब सोचता हूँ सब छोड़ दू, यहाँ के अपनों से नाता तोड़ दू,
पर किसी का जाना क्या किसी को खटका है।
दो साल हो गए मुझे यहां पर मेरा केक नहीं कटा है।।