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बेटे को भेजा अनाथ आश्रम, सब्जी बेचकर गरीबों के लिए बनवाया अस्पताल

हम सभी की जिन्दगी में एक ऐसा समय आया है जब हमें लगता है कि हम सब कुछ हार चुके है. लगता है कि पता नहीं हमारी आने वाली जिन्दगी में क्या होगा? शायद वह हमारी जिन्दगी का सबसे बुरा समय होता है. ज्यादातर लोग ऐसी परिस्थिति में हार मान लेते है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते है जो ऐसे समय में हिम्मत नहीं हारते हुए परिस्थिति का सामना करते है और बाकी लोगों के मिसाल कायम कर लेते है. आज हम आपको ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी सुनाने जा रहे है. यह कहानी है कोलकता के पास एक छोटे से गाँव में रहने वाली 74 वर्षीय सुभाषिनी मिस्त्री की.

गरीबी में कटा जीवन

दरअसल सुभाषिनी मिस्त्री को इस वर्ष पद्म श्री पुरुस्कार के लिए चुना गया है. सभाषिनी मिस्त्री एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने खुद गरीबी में अपना जीवन काटकर लोगों की सेवा की है. गरीबी में पली बड़ी सुभाषिनी मिस्त्री का सपना था कि वह गरीबों के लिए अस्पताल बनवाए, लेकिन अस्पताल बनवाने के लिए सुभाषिनी के पास में पैसे नहीं थे. ऐसे में कोई भी होता तो हार मान लेता, लेकिन सुभाषिनी ने हार नहीं मानी और उन्होंने अस्पताल बनवा लिया.

इलाज के अभाव में पति की मौत

सुभाषिनी की शादी मात्र 12 वर्ष की उम्र में हो गई थी. जब सुभाषिनी की उम्र 23 वर्ष की थी, उस समय उनके पति की पैसों की कमी और डॉक्टरों की लापरवाही के कारण मौत हो गई. अपने पति की मौत के बाद सुभाषिनी को अपने चार बच्चों को अकेले पालना पड़ा. कई दिनों तक दुःख और चिंता में रहने के बाद सुभाषिनी ने निर्णय लिया कि जो उनके साथ हुआ, वो किसी के साथ नहीं होगा. वो खुद अपने गांव में अस्पताल बनवाएगी, लेकिन सामने तो चार भूखे बच्चे भी थे.

घर-घर किया काम

सुभाषिनी का एक बेटा पढ़ने में अच्छा था तो उन्होंने उसे कोलकता के अनाथ आश्रम में भेज दिया. इसके बाद सुभाषिनी ने खाना बनाना, बर्तन-कपड़े धोना, झाड़ू-पोछा करने से लेकर मजदूरी तक सारे काम किए. इसके बाद वह खुद सब्जी उगाकर बेचने लगी. ऐसा करते-करते सुभाषिनी को 20 साल लग गए और 20 साल तक पैसे बचाकर सुभाषिनी ने 10,000 रुपये में एक एकड़ जमीन खरीदी और वहां एक टेम्पररी शेड बनाया.

Humanity hospital

आखिरकार सुभाषिनी का सपना पूरा हुआ और ‘Humanity hospital’ नाम का अस्पताल बनाया गया. इसके बाद लाउडस्पीकर की मदद से शहर में डॉक्टर्स से फ्री सेवा की विनती की गई. कुछ डॉक्टर्स इस काम के लिए आगे भी आए. पहले ही दिन इस अस्पताल में 252 मरीजों का इलाज हुआ. बारिश में अस्पताल में बहुत समस्या आती थी, जिसके बाद सुभाषिनी के बेटे ने स्थानीय सांसद के आगे मदद की गुहार लगाई. बहुत कोशिशों के बाद अस्पताल को सीमेंट की छत मिल गई.

आज ऐसा है अस्पताल

Humanity hospital के पास आज 3 एकड़ की जमीन है. यह अस्पताल 9,000 स्क्वायर फीट में बना हुआ है. यह अब दो मंजिला हो चुका है. यहाँ गरीबों का मुफ्त में इलाज होता है. गरीबी रेखा के ऊपर के लोगों से 10 रुपए की फीस ली जाती है. हालाँकि सुभाषिनी का कहना है कि उनका सपना आज भी पूरा नहीं हुआ है. उनका कहना है कि, ‘जिस दिन यह अस्पताल सर्व-सुविधा संपन्न हो जाएगा. 24 घंटे अपनी सेवाएं दे पाएगा. तब मैं चैन से मर पाऊंगी.’