कवि की कलम से 3 – दो साल हो गए मुझे, पर यहां मेरा केक नहीं कटा है।

इंसान यहाँ दुसरो की खुशी और गम में बटा है। दो साल हो गए मुझे, पर यहां मेरा केक नहीं कटा है।। पहले था राईटर, अब में लीडर हो गया, डरता था पहले अब में निडर हो गया। मेरे सामने ये संसथान कितना बड़ा-कितना घटा है दो साल हो गए…

कवि की कलम से 1 – जाते हुए मांझी का सलाम ले जा

जाते हुए मांझी का सलाम ले जा, जो लगे तो ये पैगाम ले जा। जो न चला तेरा दिमाग दुरुस्त तो २ किलो बादाम ले जा, जाते हुए मांझी का सलाम ले जा।। जो सुबह की किरण बुदबुदाए तुझको, तो सुर्ख अंधेरो में कटी शाम ले जा। जाते हुए मांझी…