जब भगवान शिव और भगवान राम के बीच हुआ युद्ध

हम सब बचपन से ही रामायण के बारे में बचपन से ही पढ़ते, सुनते या टीवी पर देखते आ रहे है. आपको याद होगा कि रामायण में अश्वमेघ यज्ञ का भी प्रसंग है. देखो अश्वमेघ यज्ञ में ऐसा था कि वह जहाँ से भी गुजरता वह राज्य भगवान श्री राम के अधीन हो जाता. तो एक बार क्या हुआ कि अश्वमेघ यज्ञ देवपुर पहुँच गया. अब यहाँ समझने वाली बात यह है कि देवपुर का राजा वीरमणि था और राजा वीरमणि के पास भगवान शंकर का वरदान था. हुआ यह था कि राजा वीरमणि ने भगवान शंकर की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया था और उनसे पूरे राज्य की रक्षा का वरदान मांग लिया था.

जब यज्ञ के अश्व देवपुर पहुंचे तो उनको वहां पकड़ लिया. अब अश्व पकड़े गए तो इसका मतलब यह हुआ कि यज्ञ भंग हुआ और युद्ध होगा. ऐसे में वहां लड़ाई लड़ने के लिए भगवान राम की तरफ से हनुमान, शत्रुघ्न पहुंचे और उधर सामने राजा वीरमणि, अपने भाइयों और अपने पुत्रों के साथ लड़ने पहुँच गए. देखते ही देखते दोनों पक्षों में भयंकर युद्ध छिड गया. अब यह तो हमें पता ही है कि भगवान हनुमान से लड़ना किसी के बस की बात नहीं है. हनुमान जी ने एक पेड़ को उठाकर वीरमणि के भाई वीरसिंह पर फेंक दिया. इससे वह बेहोश हो गए. उधर राजा वीरमणि को भरत के पुत्र पुष्कल ने अपने बाणों से बेहोश कर दिया.

थोड़ी देर बाद राजा वीरमणि को होश आया तो उन्होंने देखा कि उनकी सेना हार जाएगा, तो ऐसे में उन्होंने भगवान शिव किया को याद किया. अब भगवान शिव को पता चला तो उन्होंने नंदी और भृंगी सहित अपने सारे गण राजा को वीरभद्र के नेतृत्व में वीरमणि की मदद के लिए भेज दिया. वीरभद्र सेना के साथ युद्ध के मैदान में पहुंचे और सबसे पहले उन्होंने भरत के पुत्र पुष्कल का सर काट दिया. उधर भृंगी ने शत्रुघ्न को बंदी बना लिया.

अब शिव की सेना के लिए सबसे बड़ी समस्या भगवान हनुमान थे, क्यों कि वह किसी के बस में नहीं आ रहे थे. किसी को समझ नहीं आ रहा था कि इनको कैसे वश में करें. उसी समय नंदी ने शिव अस्त्र का उपयोग किया और भगवान हनुमान को बेहोश कर दिया. शिव की सेना के आते ही राजा वीरमणि की सेना भगवान राम की सेना पर भारी पड़ने लगी. अपनी सेना को हारता देख शत्रुघ्न ने श्री राम को याद किया.

शत्रुघ्न के याद करते ही भगवान राम, लक्ष्मण और भरत के साथ वहां पहुंचे और भगवान हनुमान और शत्रुघ्न को मुक्त कराया. अपनी सेना की हालत देख भगवान राम ने शिव की सेना पर हमला बोल दिया, लेकिन उनके बाणों कुछ भी असर शिव की सेना पर नहीं हो रहा था. भगवान राम को जल्दी ही पता चल गया कि यह आम सेना नहीं है. तो उन्होंने विश्वामित्र के द्वारा प्रदान किए गए दिव्यास्त्रों को चलाना शुरू कर दिया. अब वीरभद्र और नंदी विश्वामित्र के द्वारा प्रदान किए गए दिव्यास्त्रों के सामने नहीं टिक सके. भगवान राम के आते ही उनकी सेना शिव की सेना और राजा वीरमणि की सेना पर भारी पड़ने लगी. युद्ध मैदान में भयंकर हाहाकार मच गया और शिव की सेना, महादेव शिव को याद करने लगी.

अब भगवान शिव को जैसे ही पता चला कि उनकी सेना उन्हें बुला रही है, वह तुरंत युद्ध के मैदान में पहुँच गए. जैसे ही भगवान शिव वहां पहुंचे, भगवान राम की पूरी सेना बेहोंश हो गई. भगवान राम ने भी जब वहां भगवान शिव को देखा तो उन्होंने भी अपने शस्त्र अलग रख दिए और भगवान शिव को दंडवत प्रणाम किया. श्री राम ने भगवान शिव से कहा कि यह यज्ञ आपकी आज्ञा से ही हो रहा है. अब आप ही इस युद्ध का निर्णय करें. भगवान राम की बात सुनकर भगवान ने शिव ने कहा कि आप स्वयं विष्णु के अवतार हैं और मैं आपसे युद्ध नहीं लड़ना चाहता, लेकिन मैंने राजा वीरमणि को वरदान दिया है तो मुझे उनकी रक्षा करनी पड़ेगी और मुझसे युद्ध करे.

भगवान शिव की आज्ञा पाकर श्रीराम ने अपने धनुष-बाण उठा लिए और दोनों भगवान के बीच भयंकर युद्ध छिड गया. भगवान शिव ने एक-एक कर अपने सभी दिव्यास्त्रों का उपयोग भगवान शिव पर किया, लेकिन भगवान शिव पर उनका कोई असर नहीं हुआ. अब श्री राम के पास सिर्फ एक ही दिव्यास्त्र बचा था जो उन्होंने भगवान शिव से ही प्राप्त किया था, वह था पाशुपतास्त्र. जब श्रीराम ने शिव द्वारा रचित पाशुपतास्त्र का उपयोग शिव पर ही कर दिया. पाशुपतास्त्र सीधा शिव के हृदय स्थल में समा गया. भगवान राम की युद्ध की कुशलता को देख भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए. उन्होंने श्री राम से वरदान मांगने को कहा.

इसके बाद श्री राम ने भगवान शिव से युद्ध में मारे गए समस्त सैनिकों और महावीरों के प्राण वापस मांगे. शिव ने सब को जीवनदान दिया. इसके बाद शिव की आज्ञा से राजा वीरमणि ने अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े श्रीराम को वापस कर दिए और स्वयं शत्रुघ्न के साथ उनकी रक्षा के लिए आगे बढ़ गए. आपको यह कथा अच्छी लगी हो तो इसे अपने दोस्तों तक भी पहुंचाए और इसे शेयर करें.

mohit sharma