आखिर क्या है मौत? जानिए इस आसान से उदाहरण से

बदलते वक़्त के साथ-साथ परिस्थितियों का बदलना भी स्वाभाविक है, लेकिन कुछ लोग बदली हुई परिस्थितियों से तालमेल स्थापित नहीं कर पाते है और निराशा के गहरे पानी में फंसकर डूबने लगते हैं. ऐसी निराशाजनक विषम परिस्थितियों में किसी अपने जिसे हम जान से भी ज्यादा प्यार करते है की मृत्यु दिल को हिला देने वाली होती है. क्या अपने आत्मीय जिसे हम जान से भी ज्यादा चाहते है के ऐसे वियोग अथवा बिछड़ने की भयंकर पीड़ा व उससे उत्पन्न निराशा से बचना संभव है?

 

इस आसान से उदाहरण से समझे

कुछ समय पहले ही मैंने एक अख़बार में पढ़ा था कि एक व्यक्ति के बेटे की मौत सड़क पर बने एक गड्ढे में गिरने के कारण हुई दुर्घटना में हो गई. उसके बाद उस व्यक्ति ने सड़कों पर बने गड्ढे भरना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया. इस व्यक्ति का नाम दादाराव बिल्होरे है, जिनके 16 साल के बेटे की एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी. उसके युवा बेटे प्रकाश की बाइक सड़क पर बने एक गड्ढे के कारण फिसल कर गिर गई और वह बुरी तरह से घायल हो गया. कुछ समय के बाद उसने दम तोड़ दिया. इस दुर्घटना ने दादाराव बिल्होरे की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदलकर रख दी. उन्हें जब अपने साथ हुई इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना जैसी अन्य दुर्घटनाओं की ख़बरें सुनने को मिलतीं तो वो बेचैन हो जाते थे. ये ख़बरें दादाराव को अन्दर तक झकझोर कर रख देतीं है.

 

आखिर क्या किया बाद में दादाराव बिल्होरे ने

अन्य सब दुर्घटनाओं की ख़बरें सुनने के बाद दादाराव ने एक दिन ये फ़ैसला लिया कि आगे से सड़कों पर बने गड्ढों के कारण किसी को नहीं मरने देंगे. दादाराव बिल्होरे ने स्थानीय अधिकारियों के पास जाकर अपने इलाक़े और मुंबई के अन्य हिस्सों में गड्ढों वाली सड़कें ठीक करने के लिए आग्रह करना शुरू किया, लेकिन जब अधिकारियों ने दादाराव बिल्होरे की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया, तो उसके बाद से उन्होंने अपने बेटे को श्रद्धांजलि के रूप में गड्ढे भरने का काम स्वयं करना शुरू कर दिया. अब दादाराव बिल्होरे सप्ताह के 5 दिन अपना सब्ज़ी बेचने का काम करते हैं और शेष दो दिन सड़कों के गड्ढे भरते हैं, इस काम से उनके मन में ये संतुष्टि रहती है कि अब किसी और को उनकी तरह अपने परिवार का सदस्य नहीं खोना पड़ेगा. अब दादाराव बिल्होरे को लोग पॉटहोल दादा कहकर बुलाते हैं और सड़कों के गड्ढे भर जाने से असंख्य लोगों की ज़िंदगी बचने का कारण भी बनते हैं.

 

संतुष्टि से भरते है अंदर के घाव

जब जीवन में किसी भी कारण से कुछ संतुष्टि मिलती है, तो अंदर के घाव भी भरने लगते हैं. मौत जीवन का कड़वा सत्य है. लेकिन अपनों से बिछुड़ने की पीड़ा व निराशा से बचने के लिए ही नहीं जीवन में आगे बढ़ने के लिए भी ज़रूरी है कि हम बदली हुई परिस्थितियों को स्वीकार कर उनके अनुरूप स्वयं को परिवर्तित करने की कोशिश जरुर करें.